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वन अधिकार कानून- क्रियान्यवयन अभियान

13 दिसम्बर 2005 के पूर्व वन भूमि पर काबिज किसानों को वन अधिकार पत्र
सभी ग्रामों को उनके पारंपरिक सीमा का सामुदायिक अधिकार, सामुदायिक वन संसाधन का अधिकार पत्र
विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा, भारिया, सहरिया को उनकी बसाहट के एक से अधिक ग्रामों की पांरपरिक सीमा को मिलाकर विशेष हैबिटेट राईटस का अधिकार दिलाना।
जिन किसानों को वन अधिकार पत्र दे दिया गया है उनकी वाजिब भूमि को उनके अधिकार पत्र में अंकित कराना।
एंव अन्य कानूनी अधिकार दिलाना !

ग्रामसभा सशक्तिकरण अभियान

ग्रामसभा सशक्तिकरण अभियान


पेसा ग्रामसभा : केन्द्र ने 1996 में पेसा कानून पूरे देश में लागू किया, पेसा को राज्य में लागू करने के लिए विधान मंडल में कानून बनाया जाना था, लेकिन मध्यप्रदेश में नियम बनाया गया जो 15 नवंबर 2022 से  म.प्र. के अनुसूचित क्षेत्रों में लागू हुआ, इस नियम में स्पष्ट है कि ग्रामसभा ग्राम की पारंपरिक सीमा का मालिक है। इस कानून में ग्राम के विकास हेतु पंचायत को प्रस्ताव, वन उपज संग्रहण एंव विक्रय, जल प्रबंधन, शराब एंव नशे की सामग्री पर निंयत्रण, भूमि अधिग्रहण पर ग्रामसभा की सहमति, ग्राम में कार्यरत शासकीय अशासकीय विभागों का निरिक्षण, पारंपरिक रीति रिवाज पंरपराओं का संरक्षण, खनिज संपदा, ग्राम में आपसी समझौता ग्राम न्यायालय में आपसी लड़ाई झगड़े का निपटान आदि अन्य विषयों पर ग्रामसभा सशक्त हो कार्यवाही करेगी।


वन अधिकार ग्रामसभा : वन अधिकार ग्रामसभा वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के क्रियान्यवयन हेतु ग्राम में ग्रामसभा की समस्त कार्यवाही हेतु वन अधिकार ग्रामसभा को सशक्त करना।


रूढ़ी प्रथा पारंपरिक ग्रामसभा का सशक्तिकरण :
ग्राम में ग्राम की बसाहट के साथ ही पारंपरिक ग्रामसभा का गठन सदियों से चला आ रहा है जो ग्राम में शांति व्यवस्था, ग्राम में न्यायिक व्यवस्था, संस्कृति रीति रिवाज पंरपराओं का संरक्षण, धार्मिक व्यवस्थाओं का संरक्षण, पारंपरिक सीमा का प्रबंधन करते आ रही है जिसमें ग्राम में मुकददम पटेल मुखिया होता है एंव अन्य दिवान, कोटवार, बैगा भुमका, आदि पदेन सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रूप से संचालित होते आ रहे है वर्तमान में पांरपरिक कोटवार को शासकीय कोटवार नियुक्त कर दिया गया है। ग्राम मुकददम पटेल राजस्व जमा वसूलते थे वह पंरपरा भी अब बंद हो गई है। पांरपरिक ग्रामसभा का सशक्तिकरण अभियान

जलवायु परिवर्तन

आदिवासी क्षेत्रों से पलायन कर आदिवासी मजदूर केरल आंध्रा, महाराष्ट्र, गुजराज राजस्थान दिल्ली आदि राज्यों में मजदूरी करने पलायन करते है, प्रतिवर्ष गर्मी का तापमान बढ़ने से मजदूर तापमान में झुलस रहें है, इससे अनेक मजदूर गंभीर बिमारी के शिकार हो मौत को गले लगा रहे हैं।
चूंकि जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों से होने वाले नुकसान हानि के लिए हमारे देश में राज्य में कोई कानून नहीं है, सर्व आदिवासी समाज की मांग है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों को मूल अधिकार में जोड़ा जावे, जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को उसका लाभ मिल सके। साथ ही इस अभियान को समाज में होने वाले पारंपरिक कार्यक्रम, जन्म, विवाह, मरण संस्कार सहित अन्य संस्कारों में वृक्ष लगाने की पंरपरा का अभियान तथा वनों की सुरक्षा पर्यावरण की सुरक्षा पर समाज को जागरूक करना है।